महान योद्धा, विद्वान और परमार वंश के गौरव महाराजा भोज देव परमार की जयंती के इस पावन अवसर पर आपको भी हार्दिक शुभकामनाएँ!
राजा भोज केवल एक शासक नहीं थे, बल्कि वे ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति के संरक्षक थे।
विशेष समाचार: मालवा के सूर्य ‘चक्रवर्ती सम्राट राजा भोज’ का जन्मोत्सव आज
धार/भोपाल: आज भारत के उस प्रतापी राजा का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है, जिनकी विद्वता और वीरता की गाथाएँ 1000 साल बाद भी जीवित हैं। ‘कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली’ जैसी कहावतें आज भी उनकी महानता और ऊँचाई को दर्शाती हैं। 11वीं शताब्दी में मालवा (धारानगरी) के राजसिंहासन पर विराजमान होने वाले महाराजा भोज देव परमार न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि वे 84 से अधिक ग्रंथों के रचयिता और एक अद्वितीय शिल्पकार भी थे।
संस्कृति और संस्कृत के रक्षक
राजा भोज ने धार में ‘भोजशाला’ की स्थापना की थी, जो उस समय का सबसे बड़ा संस्कृत विश्वविद्यालय और सरस्वती साधना का केंद्र था। उनके शासनकाल में संस्कृत को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था और कहा जाता है कि उनके राज्य में एक साधारण बुनकर भी शुद्ध संस्कृत में काव्य पाठ करने में सक्षम था।
भारत को ‘सोने की चिड़िया’ बनाने में योगदान
स्थापत्य कला: भोपाल (भोजपाल) शहर और भोजपुर के विशाल शिव मंदिर का निर्माण उनकी दूरदर्शी सोच का परिणाम है।
जल प्रबंधन: उन्होंने एशिया की सबसे बड़ी कृत्रिम झील का निर्माण कराया था, जिसने कृषि और सिंचाई के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी, जिससे क्षेत्र आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ।
ज्ञान का भंडार: खगोल विज्ञान, व्याकरण, आयुर्वेद और वास्तुकला पर उनके लिखे ग्रंथ आज भी शोध का विषय हैं।
शौर्य की गाथा
इतिहासकारों के अनुसार, जब विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया था, तब राजा भोज ने अन्य राजाओं के साथ मिलकर उसे कड़ी चुनौती दी थी। उनकी सैन्य शक्ति इतनी विशाल थी कि उनके भय से कई शत्रु सीमा पार करने का साहस नहीं कर पाते थे।
“अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती। पण्डिता मण्डिता: सर्वे भोजराजे भुवंगते॥”
(अर्थात: जब तक राजा भोज इस धरती पर हैं, धारानगरी ज्ञान का आधार है, सरस्वती को सहारा है और सभी पंडित सम्मानित हैं।)

