नई दिल्ली।
UGC द्वारा जनवरी 2026 में जारी किए गए Equity Regulations को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। जहां एक ओर जनरल कैटेगरी छात्रों का विरोध जारी है, वहीं अब इस मुद्दे पर संसदीय समिति से जुड़े वरिष्ठ नेता और कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है।
बताया जा रहा है कि दिग्विजय सिंह उस संसदीय स्थायी समिति के चेयरपर्सन/नेतृत्वकारी भूमिका में थे, जिसने UGC के ड्राफ्ट Equity Regulations की समीक्षा कर दिसंबर 2025 में सर्वसम्मति से रिपोर्ट पेश की थी।
Payal Tadvi और Rohith Vemula मामलों से शुरू हुई प्रक्रिया
UGC Equity Regulations की नींव फरवरी 2025 में पड़ी, जब पायल तड़वी और रोहित वेमुला की माताओं की पहल और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद मोदी सरकार और UGC को ड्राफ्ट नियम लाने पड़े। उद्देश्य था—उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न को रोकना।
दिसंबर 2025: संसदीय समिति की सर्वसम्मत रिपोर्ट
संसद की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति ने UGC के ड्राफ्ट नियमों की समीक्षा कर कई अहम सिफारिशें कीं, जिन्हें समिति ने सर्वसम्मति से मंज़ूरी दी। इनमें प्रमुख सिफारिशें थीं—
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OBC को जातिगत भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से शामिल करना
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दिव्यांगता को भेदभाव के एक स्वतंत्र आधार के रूप में जोड़ना
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Equity Committee में SC, ST और OBC समुदायों का 50% से अधिक प्रतिनिधित्व
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भेदभाव के कृत्यों की स्पष्ट और विस्तृत सूची
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वार्षिक सार्वजनिक रिपोर्ट, अनिवार्य सेंसिटाइजेशन और मानसिक स्वास्थ्य व कानूनी सहायता
जनवरी 2026: UGC के अंतिम नियम
UGC ने अंतिम Regulations में समिति की कुछ सिफारिशें तो मान लीं, लेकिन—
✔ OBC और दिव्यांगता को शामिल किया
✔ पारदर्शिता और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधान जोड़े
❌ Equity Committee में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की सिफारिश
❌ भेदभाव की स्पष्ट सूची देने की सिफारिश
इन दोनों अहम सुझावों को नजरअंदाज़ कर दिया गया।
दिग्विजय सिंह का सोशल मीडिया पोस्ट
इसी संदर्भ में दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर UGC और केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा—
“Payal Tadvi और Rohith Vemula की माताओं तथा सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद ड्राफ्ट Equity Regulations लाए गए। संसदीय समिति ने सर्वसम्मति से इन्हें मजबूत करने की सिफारिशें कीं, लेकिन UGC ने प्रतिनिधित्व और भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा जैसे अहम सुझावों को नज़रअंदाज़ कर दिया।”
दिग्विजय सिंह ने यह भी संकेत दिया कि जब समिति की रिपोर्ट सर्वसम्मति से पारित थी, तो उसे आंशिक रूप से लागू करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भावना के खिलाफ है।
फर्जी मामलों पर दंड हटाने पर भी सवाल
UGC ने अंतिम नियमों में वह प्रावधान भी हटा दिया, जिसमें झूठी शिकायत दर्ज कराने पर दंड का उल्लेख था।
दिग्विजय सिंह के अनुसार, यह फैसला UGC का अपना था, न कि संसदीय समिति की सिफारिश।
जनरल कैटेगरी छात्रों का विरोध
विरोध मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर केंद्रित है—
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झूठे मामलों पर कार्रवाई का प्रावधान हटाना
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केवल SC, ST और OBC को ही जातिगत भेदभाव का शिकार मानना
हालांकि, संसदीय समिति की रिपोर्ट में जनरल कैटेगरी को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी—यह निर्णय भी UGC का ही था।
अब गेंद UGC और शिक्षा मंत्रालय के पाले में
राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों का मानना है कि यदि UGC संसदीय समिति की पूरी सिफारिशों को लागू करता है, तो
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वास्तविक पीड़ितों को मज़बूत सुरक्षा मिलेगी
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और नियमों के दुरुपयोग की आशंका भी कम होगी
- फिलहाल, इस विवाद के समाधान की जिम्मेदारी UGC और शिक्षा मंत्रालय पर टिकी हुई है।

