मेवाड़ की आन-बान-शान, वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक वीर शिरोमणि महाराणा संग्राम सिंह जी (राणा सांगा) की पुण्यतिथि पर आज पूरा राष्ट्र श्रद्धा और सम्मान के साथ उन्हें नमन कर रहा है।
महाराणा सांगा न केवल मेवाड़, बल्कि सम्पूर्ण भारत के ऐसे महान योद्धा थे, जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध क्षत्रिय स्वाभिमान, राष्ट्रधर्म और सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। इतिहास में वे उस वीर के रूप में अमर हैं, जिनके शरीर पर 80 से अधिक युद्ध घाव, एक आँख और कई अंगों के कटने के बावजूद भी पराजय का भाव नहीं आया।
राष्ट्र के लिए समर्पित जीवन
महाराणा संग्राम सिंह जी ने राजपूताना के अनेक राजाओं को एक सूत्र में बांधकर विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ संगठित संघर्ष किया। उन्होंने दिल्ली सल्तनत की ताकत को चुनौती दी और यह सिद्ध किया कि मेवाड़ की धरती पर झुकना नहीं, बल्कि लड़ना परंपरा है।
उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश देता है कि
स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रभक्ति किसी भी बलिदान से ऊपर होती है।
वीरता की अमर प्रेरणा
राणा सांगा केवल एक शासक नहीं थे, बल्कि वे एक विचार थे—
एक ऐसा विचार जो कहता है कि
“शरीर घायल हो सकता है, लेकिन आत्मा कभी पराजित नहीं होती।”
आज उनकी पुण्यतिथि पर देशभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम, पुष्पांजलि और वीर गाथाओं के माध्यम से उन्हें याद किया जा रहा है।
कोटिशः नमन
मेवाड़ के इस अमर सपूत को उनकी पुण्यतिथि पर
कोटि-कोटि नमन।

