कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी ने एक बार फिर राजनीति में त्याग और सिद्धांतों की मिसाल पेश की है। उन्होंने राज्यसभा जाने से इनकार कर कांग्रेस की सियासत में बड़ा संदेश दिया है।
दिग्विजय सिंह वर्तमान कांग्रेस में सोनिया गांधी जी के बाद ऐसे दूसरे नेता माने जा रहे हैं, जिन्होंने सत्ता और पद से ऊपर संगठन और विचारधारा को रखा है। इससे पहले भी उन्होंने एक बार ऐलान कर लगातार 10 वर्षों तक कांग्रेस पार्टी में कोई पद स्वीकार नहीं किया था।

राजनीति में पद नहीं, विचारधारा सर्वोपरि
दिग्विजय सिंह का यह कदम ऐसे समय में आया है जब राजनीति में पद और सत्ता की दौड़ तेज़ है। राज्यसभा जैसी प्रतिष्ठित जिम्मेदारी को ठुकराकर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए राजनीति सत्ता नहीं, बल्कि सेवा और सिद्धांतों का माध्यम है।
कांग्रेस में त्याग की परंपरा को आगे बढ़ाया
कांग्रेस पार्टी में त्याग की राजनीति की परंपरा रही है। सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद का त्याग और अब दिग्विजय सिंह द्वारा राज्यसभा से इनकार—इन दोनों फैसलों ने पार्टी के अंदर वैचारिक राजनीति की बहस को फिर से ज़िंदा कर दिया है।

सियासी हलकों में चर्चा तेज
दिग्विजय सिंह के इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। समर्थक इसे उनके राजनीतिक कद और नैतिक साहस का प्रतीक बता रहे हैं, वहीं विरोधी इसे अलग नजरिये से देख रहे हैं। लेकिन इतना तय है कि यह फैसला कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
अनुभव और संघर्ष की लंबी राजनीतिक यात्रा
कई दशकों की राजनीतिक यात्रा में दिग्विजय सिंह ने संगठन, सरकार और विपक्ष—तीनों भूमिकाओं को निभाया है। उनका यह फैसला उनके उसी राजनीतिक चरित्र को दर्शाता है, जिसमें व्यक्ति से ज्यादा पार्टी और विचारधारा को महत्व दिया जाता है।
