मेवाड़ की पावन धरा न केवल अपने शौर्य और इतिहास के लिए जानी जाती है, बल्कि यहाँ की कुलदेवियों और परंपराओं ने राजपूत समाज की आत्मा को सदियों से संबल दिया है। इसी गौरवशाली परंपरा का जीवंत प्रतीक है सारंगदेवोत राजपूतों के ठिकाने बाठरड़ा के राजमहल परिसर में स्थित कुलदेवी बायण माताजी का प्राचीन मंदिर।
सारंगदेवोत राजपूतों के ठिकाने बाठरड़ा के राजमहल परिसर में स्थित कुलदेवी बायण माताजी का प्राचीन मंदिर।
यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि मेवाड़ की सांस्कृतिक चेतना, राजपूती स्वाभिमान और वंश परंपरा का केंद्र माना जाता है। बाठरड़ा ठिकाने के राजमहल में स्थित यह मंदिर पीढ़ियों से सारंगदेवोत राजपूत वंश की आस्था का प्रमुख आधार रहा है।
कुलदेवी बायण माताजी: संरक्षण और शक्ति का प्रतीक
मान्यता है कि कुलदेवी बायण माताजी ने सदैव अपने वंश की रक्षा की है और युद्ध, संकट व निर्णय के समय राजपूतों को शक्ति, साहस और मार्गदर्शन प्रदान
किया है। किसी भी शुभ कार्य, विवाह, युद्ध या महत्त्वपूर्ण निर्णय से पूर्व बायण माताजी की पूजा-अर्चना की परंपरा आज भी निभाई जाती है।
राजमहल में स्थित ऐतिहासिक धरोहर
बाठरड़ा का राजमहल स्वयं में मेवाड़ की स्थापत्य कला और राजसी वैभव का अद्भुत उदाहरण है। इसी राजमहल के भीतर स्थित बायण माताजी का मंदिर आस्था और इतिहास का संगम प्रस्तुत करता है। मंदिर की प्राचीन संरचना, शांत वातावरण और देवी की दिव्य उपस्थिति श्रद्धालुओं को सहज ही आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है।
आज भी जीवंत परंपरा
आज भी सारंगदेवोत राजपूत समाज के लोग विशेष अवसरों पर यहाँ दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि, कुलपूजन एवं पारिवारिक अनुष्ठानों के समय मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें दूर-दूर से श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं।
मेवाड़ की पहचान
कुलदेवी बायण माताजी का यह मंदिर केवल बाठरड़ा ठिकाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समूचे मेवाड़ और राजपूत समाज की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मंदिर आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों, संस्कारों और गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का कार्य करता है।
बाठरड़ा का राजमहल और उसमें विराजमान कुलदेवी बायण माताजी का मंदिर—मेवाड़ की उस अमिट आस्था का प्रतीक है, जहाँ भक्ति, परंपरा और वीरता एक साथ सांस लेते हैं।

