मेरठ कि एक दलित कि बेटी एक सवर्ण लड़के के साथ चली गयी तो

सवर्ण कि बेटी दलित लड़के के साथ गयी तो सब चुप,

दलित का लड़की सवर्ण लड़के के साथ गयी तो पुरे देश में हड़कंप, जातिवादी नेता सड़कों पर दौड़ रहे क्यों ?

 

बेटी तो बेटी है फिर किसी भी हिंदू कि हो, वह ब्राम्हण, क्षत्रिय, ओबीसी दलित हो !

 

सन् 2019 का वह घटना हम सभी को याद है, जब विधायक राजेश मिश्रा जी कि बेटी दलित लड़के अजितेश कुमार के साथ भाग गयी थी फिर विवाह कि तब यही दलित समाज उसे अभिव्यक्ति कि आजादी और लोकतंत्र कि खुबसूरती बयां रहा था !

 

जब मेरठ कि एक दलित कि बेटी एक सवर्ण लड़के के साथ चली गयी तो लोगों को यहां लोकतंत्र कि खुबसूरती और अभिव्यक्ति कि आजादी नहीं जाति दिख रहा ?

आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों ?

 

जिस प्रकार दलित लड़की रुबी और सवर्ण पारस सोम घर से गये, 3-4 जगह बदले, पब्लिक यातायात में सफर किए, होटल में रुके क्या बिना रजामंदी के संभव है ?

 

एक बार लड़का, लड़की भाग जाते हैं, लेकिन फिर लड़की के घरवालों के दवाब में जब प्रशासन बरामद करता है, तो ज्यादातर लड़कियां घर, परिवार व रिश्तेदारो के दवाब व लोकलाज के डर से बयांन बदल देती है। और अगवा करने का झूठा आरोप लगा देती है ! और फिर प्रेम में अंधा मजनू लड़का जेल में सजा भुगतता है ! इसलिए लड़को प्रेम करो मुर्खता नहीं !

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