सिकरवार ठाकुरों की कुलदेवी व मंदिर की कथा (लोकमान्यता)

फतेहपुर सीकरी क्षेत्र के सांता  गाँव में निवास करने वाले सिकरवार ठाकुर प्राचीनकाल से वीर, स्वाभिमानी तथा क्षत्रिय परंपरा के अनुयायी माने जाते हैं। उनकी कुल परंपरा में कुलदेवी का विशेष स्थान है, जिनकी आराधना वे पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। यह कथा ऐतिहासिक प्रमाणों से अधिक लोक-परंपरा, वंशकथा और जन-आस्था पर आधारित है, किंतु आज भी हर सिकरवार परिवार में समान श्रद्धा से सुनाई जाती है।

कुलदेवी का प्राकट्य

लोकमान्यता के अनुसार, सिकरवार वंश के पूर्वज प्राचीन समय में सीमांत क्षेत्रों की रक्षा के लिए निरंतर युद्धों में संलग्न रहते थे। युद्ध, अकाल, महामारी और राजनीतिक संकट के समय उन्होंने एक दिव्य शक्ति की उपासना आरंभ की, जिन्हें उन्होंने कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया।

कहा जाता है कि एक भीषण युद्ध के समय, जब सिकरवारों की सेना पराजय के कगार पर थी, तब उनके प्रमुख योद्धा ने रात्रि में तपस्या कर देवी से रक्षा की प्रार्थना की। उसी रात्रि देवी ने स्वप्न में दर्शन देकर वचन दिया —

“जब तक मेरी आराधना करोगे, तुम्हारा वंश सुरक्षित रहेगा।”

अगले दिन युद्ध का परिणाम अचानक बदल गया और सिकरवार विजयी हुए। तभी से देवी को कुलरक्षा की अधिष्ठात्री शक्ति माना जाने लगा।

मंदिर की स्थापना

इस दिव्य अनुभव के पश्चात सात गाँव क्षेत्र में देवी के लिए एक प्राचीन मंदिर की स्थापना की गई। कहा जाता है कि यह स्थान स्वयं देवी द्वारा चुना गया था। मंदिर निर्माण के समय कोई शिल्पकार उपलब्ध न होने पर सिकरवारों ने स्वयं पत्थर काटकर मंदिर का निर्माण किया, जिसे आज भी उनकी आस्था और परिश्रम का प्रतीक माना जाता है।

कुल परंपरा में देवी का स्थान

सिकरवार वंश में आज भी:

  • विवाह से पहले देवी पूजन

  • युद्ध या बड़े निर्णय से पहले कुलदेवी की आराधना

  • संतान जन्म, गृह प्रवेश, फसल कटाई आदि अवसरों पर विशेष पूजन

अनिवार्य रूप से किया जाता है। माना जाता है कि देवी के बिना पूजन किए कोई भी शुभ कार्य पूर्ण फलदायी नहीं होता।

देवी की महिमा

लोकविश्वास है कि जब-जब सिकरवार वंश संकट में पड़ा, तब-तब देवी ने किसी न किसी रूप में रक्षा की —
कभी संकेत द्वारा, कभी स्वप्न में, कभी किसी साधु के वचन के माध्यम से।

आज भी सात गाँव के लोग कहते हैं —

“जहाँ सिकरवार है, वहाँ उसकी कुलदेवी की छाया है।”

निष्कर्ष

यह कथा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सिकरवार ठाकुरों की सांस्कृतिक पहचान, वीरता, स्वाभिमान और एकता की प्रतीक है। कुलदेवी का मंदिर आज भी उनके गौरवशाली इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का जीवंत प्रमाण है।

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